कवर्धा में 'साहब' का हाई-वोल्टेज अहंकार: करोड़ों की सरकारी जमीन पर अतिक्रमण, शिकायत पर भड़के CMO नारायण साहू; गृह मंत्री के गृह नगर में बेखौफ अफसरशाही पर उठे गंभीर सवाल ?


कवर्धा।
सूबे के कद्दावर नेता और उपमुख्यमंत्री व गृह मंत्री विजय शर्मा के निर्वाचन क्षेत्र और ऐतिहासिक धर्म नगरी कवर्धा में इन दिनों अफसरशाही के तेवर सातवें आसमान पर हैं। मामला पुराने नगर पालिका परिसर की खाली पड़ी करोड़ों रुपये की बेशकीमती सरकारी भूमि से जुड़ा है, जहाँ रसूखदारों द्वारा धड़ल्ले से अनाधिकृत रूप से अवैध कब्जा किया जा रहा है

हैरानी की बात यह है कि जब सजग नागरिकों और मीडिया प्रतिनिधियों द्वारा इस गंभीर भू-माफिया साठगांठ की जानकारी देने के लिए मुख्य नगर पालिका अधिकारी नारायण साहू से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो साहब ने पहले फोन उठाना मुनासिब नहीं समझा। बाद में व्हाट्सएप पर जनहित से जुड़ी इस समस्या का संदेश भेजा गया, तो सीएमओ नारायण साहू ने अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ते हुए दो टूक शब्दों में लिखा— "अब आप हमें बताएंगे कि हम लायक है कि नहीं..? रही बात फोन उठाने की कार्यालय समय में बात करिए, कार्यालय में आकर हम मिलेंगे।"


मैं सीएमओ हूँ... दफ्तर के बाद कोई फोन न करे: अधिकारी का अड़ियल तर्क


बात यहीं खत्म नहीं हुई। जब इस जनहित से जुड़े गंभीर मामले पर दोबारा बात हुई, तो प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाने या मौके पर तुरंत टीम भेजने के बजाय सीएमओ नारायण साहू ऊंची आवाज में भड़क गए। उन्होंने स्पष्ट लहजे में अपना अहंकार जाहिर करते हुए कहा कि वे एक सीएमओ हैं और कार्यालयीन समय खत्म होने के बाद कोई भी जागरूक नागरिक या पत्रकार किसी भी विषय को लेकर उन्हें फोन नहीं कर सकता।

आपातकालीन एवं निरंतर सेवा का सिद्धांत 

छत्तीसगढ़ नगर पालिक निगम/नगर पालिका अधिनियम के विधिक प्रावधानों के अनुसार, मुख्य नगर पालिका अधिकारी  का पद 24 घंटे और 365 दिन क्रियाशील रहने वाली अत्यावश्यक सेवाओं के अंतर्गत आता है। कानूनन, "रविवार या शासकीय अवकाश" का लाभ उठाकर कोई लोक सेवक लोक संपत्ति को हो रहे नुकसान या लाइव अतिक्रमण की शिकायत को सुनने से इनकार नहीं कर सकता। भू-माफियाओं द्वारा अक्सर छुट्टी के दिनों का दुरुपयोग किया जाता है, ऐसी स्थिति में अधिकारी का यह लिखित तर्क कि "कार्यालय समय में बात करिए", सीधे तौर पर भू-माफियाओं को परोक्ष रूप से सह देने और अपने वैधानिक दायित्वों से भागने जैसा है।


विवादों से पुराना नाता: बसना से लेकर गौरेला तक 'आदतन विवादित' ट्रैक रिकॉर्ड


कवर्धा में आते ही ठीक उसी पुराने अड़ियल ढर्रे पर काम करना यह साबित करता है कि सीएमओ नारायण साहू का यह विवादित रवैया कोई नया नहीं है। उनका प्रशासनिक सेवाकाल विवादों और जन-आक्रोश से भरा रहा है:


बसना नगर पंचायत (2020) में पूरी परिषद का विद्रोह: 

बसना में पदस्थापना के दौरान सीएमओ नारायण साहू की तानाशाही कार्यशैली से तंग आकर नगर पंचायत अध्यक्ष और सभी 13 पार्षदों ने सामूहिक रूप से बगावत कर दी थी। जनप्रतिनिधियों ने उन पर मनमानी करने और विकास कार्य ठप करने के गंभीर आरोप लगाकर तत्कालीन विधायक से उन्हें तत्काल निलंबित या स्थानांतरित करने की लिखित मांग की थी।


गौरेला नगर पालिका (2025) में पुलिस शिकायत और उग्र धरना:


कवर्धा आने से ठीक पहले गौरेला में भी साहब का यही ढर्रा था। आम जनता और मीडिया का फोन न उठाने व अशिष्ट व्यवहार करने के कारण गौरेला थाने में बकायदा उनके खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसके अलावा, पूर्व मुख्यमंत्री परिवार के साथ हुए प्रतिमा विवाद के बाद स्थानीय नागरिकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने कलेक्टरेट का घेराव कर हफ़्तों तक उनके निलंबन की मांग को लेकर उग्र धरना प्रदर्शन किया था।


सर्वोच्च न्यायालय के विधिक सिद्धांतों (अर्नेश कुमार फैसले) की खुली अवहेलना


कानून के जानकारों के मुताबिक, सीएमओ नारायण साहू का यह रवैया और ऊंची आवाज में बात कर दबाव बनाने का प्रयास सीधे तौर पर देश की कानून व्यवस्था को चुनौती है:


अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (माननीय सुप्रीम कोर्ट):

देश की सर्वोच्च अदालत ने अपने इस ऐतिहासिक फैसले में साफ तौर पर प्रशासनिक अधिकारियों और लोक सेवकों द्वारा अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर आम नागरिकों को मानसिक रूप से डराने, प्रताड़ित करने या शासकीय धौंस दिखाने की प्रवृत्ति पर सख्त रुख अपनाया है। एक जागरूक नागरिक या पत्रकार द्वारा शासकीय संपत्ति के नुकसान (अतिक्रमण) की सूचना देना कानूनन उसका मौलिक कर्तव्य है। ऐसे में अधिकारी द्वारा समय का बहाना बनाकर तीखी आवाज में बात करना सीधे तौर पर 'पब्लिक सर्वेंट एकाउंटेबिलिटी' (लोक सेवक की जवाबदेही) के विधिक सिद्धांत का उल्लंघन है।


24 घंटे की अनिवार्य सेवा और सिविल सेवा नियम: 

छत्तीसगढ़ नगरीय प्रशासन नियमावली के तहत सीएमओ का पद आपातकालीन लोक सेवाओं के अंतर्गत आता है। सरकारी संपत्ति की चोरी या अतिक्रमण जैसी संगीन स्थिति में कोई भी नागरिक अधिकारी को किसी भी समय सूचित करने का अधिकार रखता है। इसके विपरीत आचरण करना छत्तीसगढ़ Civil सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम-3 (गंभीर कदाचार) के तहत तत्काल सेवा से निलंबित करने के लिए पर्याप्त आधार है।


लोकहित बनाम निजता का अधिकार – क्यों कानूनन 100% जायज है सीएमओ की यह कॉल रिकॉर्डिंग?


इस मामले के उजागर होने के बाद प्रशासनिक गलियारों में निजता के अधिकार को लेकर झूठी दुहाई दी जा सकती है, लेकिन भारतीय कानून और सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले यह स्पष्ट करते हैं कि जनहित में की गई यह कॉल रिकॉर्डिंग विधिक रूप से पूरी तरह वैध है:


आर. एम. मल्कानी बनाम महाराष्ट्र राज्य (सुप्रीम कोर्ट): 

कॉल रिकॉर्डिंग की वैधता पर देश के इस सबसे बड़े फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि "यदि किसी लोक सेवक द्वारा पद के दुरुपयोग या प्रशासनिक कदाचार से जुड़ा कोई साक्ष्य बिना बताए भी रिकॉर्ड किया गया है, तो उसे खारिज नहीं किया जा सकता। बशर्ते आवाज स्पष्ट हो और मामला सार्वजनिक हित का हो।"


के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ:

सर्वोच्च न्यायालय ने साफ किया है कि निजता का अधिकार असीमित नहीं है। किसी लोक सेवक द्वारा शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही बरतने या करोड़ों की सरकारी जमीन को नुकसान पहुँचाने की स्थिति में निजता की आड़ लेकर भ्रष्टाचार को छुपाया नहीं जा सकता।


भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 59 व 63: 

नए कानूनों के तहत बिना छेड़छाड की गई कॉल रिकॉर्डिंग और व्हाट्सएप स्क्रीनशॉट को न्यायालय और लोकायुक्त 'सप्लीमेंट्री एविडेंस' (सहानुभूतिक साक्ष्य) के रूप में पूरी तरह स्वीकार करते हैं।
चूंकि यह बातचीत किसी व्यक्तिगत विषय पर नहीं बल्कि 'सरकारी जमीन की सुरक्षा' जैसे सार्वजनिक विषय पर हो रही थी, इसलिए अधिकारी यह दावा कतई नहीं कर सकते कि उनकी निजता का हनन हुआ है। यह रिकॉर्डिंग सजग नागरिकता का प्रमाण है और इसे जिला कलेक्टर, लोकायुक्त या माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष बेखौफ होकर साक्ष्य के रूप में पेश किया जा सकता है।


गृह मंत्री के गृह नगर का यह हाल, तो बाकी छत्तीसगढ़ का क्या होगा?


कवर्धा का यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक अधिकारी की तानाशाही का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के वेंटिलेटर पर होने का सबूत है। प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक संगठनों का यह तीखा सवाल पूरी तरह जायज है कि यदि सूबे के कद्दावर नेता और स्वयं गृह मंत्री विजय शर्मा के अपने निर्वाचन क्षेत्र (गृह नगर) और कवर्धा जैसी पवित्र धर्म नगरी में मुख्य नगर पालिका अधिकारी का यह हाल है, जहाँ खुलेआम करोड़ों की सरकारी जमीन लुट रही है, अफसर बेखौफ होकर नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं और शिकायत पर भू-माफियाओं के खिलाफ तत्काल विधिक कदम उठाने के बजाय अड़ियल रुख दिखा रहे हैं, तो प्रदेश के सुदूर और अन्य जिलों में स्थापित नगर पंचायतों, नगर पालिकाओं और नगर निगमों की क्या हालत होगी?
आखिर ऐसे 'आदतन विवादित' और जनता-मीडिया के प्रति असंवेदनशील छवि वाले अधिकारी को कवर्धा जैसे संवेदनशील और वीआईपी क्षेत्र में पदस्थ करने का प्रशासनिक और राजनीतिक औचित्य क्या था? वर्तमान साक्ष्यों (व्हाट्सएप चैट स्क्रीनशॉट और मूल कॉल रिकॉर्डिंग) के साथ जिला कलेक्टर (कबीरधाम), संचालक (नगरीय प्रशासन, रायपुर) और लोकायुक्त को विधिक शिकायत सौंपी जा रही है। मांग की जा रही है कि सरकारी जमीन को तुरंत मुक्त कराया जाए और इस तानाशाही रवैये वाले सीएमओ को कवर्धा से तत्काल हटाकर निलंबित किया जाए।

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