कवर्धा। लोकतंत्र में जनता का पैसा नागरिकों के खून-पसीने की कमाई है, जिसे सरकारें टैक्स के रूप में वसूलती हैं। इस पैसे का उपयोग भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर योजनाबद्ध तरीके से होना चाहिए। लेकिन छत्तीसगढ़ के कवर्धा में जो कुछ हो रहा है, वह सरकारी नीति और नियोजन के दिवालियापन का एक ज्वलंत उदाहरण है।
एक तरफ केंद्र और राज्य सरकार बड़े तामझाम के साथ जबलपुर-कवर्धा-सिमगा-रायपुर सिक्स लेन परियोजना की घोषणा करती है, जिसकी कुल लागत अरबों रुपये है। वहीं दूसरी तरफ, इसी कवर्धा में 54 करोड़ रुपये की लागत वाली एक अन्य सड़क का भूमिपूजन किया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि जब भविष्य में इसी रूट से सिक्स लेन महामार्ग को गुजरना है, तो आज 54 करोड़ रुपये फूंककर बनाई जा रही सड़क का भविष्य क्या होगा? क्या सिक्स लेन के निर्माण के समय इस 54 करोड़ की सड़क पर बुलडोजर नहीं चलाया जाएगा? यह सीधा-सीधा जनता के पैसे का खुला दुरुपयोग और प्रशासनिक अदूरदर्शिता है।
चमकते शहरों की चकाचौंध बनाम सिसकते गांव
कवर्धा का यह विरोधाभास हमारी पूरी व्यवस्था के 'अर्बन बायस' यानी शहरी-केंद्रित सोच को उजागर करता है। ऐसा लगता है कि सरकारों के लिए सारा विकास सिर्फ शहरों और बड़े हाईवे तक ही सीमित रह गया है। आज स्थिति यह है कि चमचमाते एक्सप्रेस-वे और बड़े शहरों के सौंदर्यीकरण के लिए खजाना खुला है, लेकिन देश की आत्मा कहे जाने वाले ग्राम पंचायतों के नसीब में सिर्फ उपेक्षा ही आई है।
ग्रामीण इलाकों की हकीकत आज भी बेहद कड़वी है:
शिक्षा का बदहाल ढांचा: ग्राम पंचायतों में आज भी नौनिहाल एक अच्छे और पक्के विद्यालय भवन के लिए तरस रहे हैं। कई गांवों में स्कूल एकल शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं या भवन जर्जर हो चुके हैं, लेकिन वहां सुधार के लिए बजट का रोना रोया जाता है।
सिसकती स्वास्थ्य सेवाएं: ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र केवल कागजों पर या नाममात्र के ढांचों में सिमट कर रह गए हैं। न वहां पर्याप्त डॉक्टर हैं, न जीवनरक्षक दवाइयां। इलाज के अभाव में आज भी ग्रामीणों को मीलों दूर जिला अस्पताल या शहरों की दौड़ लगानी पड़ती है।
बूंद-बूंद पानी को तरसती आबादी: दावों के विपरीत आज भी कई अंदरूनी गांवों में स्वच्छ पीने का पानी एक सपना है। महिलाएं आज भी कोसों दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं।
कीचड़ से सनी जिंदगी: जिन गांवों से होकर देश के बड़े नेता गुजरते हैं, उन्हीं गांवों के भीतर एक अदद सीसी रोड तक नसीब नहीं है। बरसात के दिनों में ये गांव टापू बन जाते हैं, और किसी बीमार को खाट पर लादकर मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है।
'बनाओ और तोड़ो' का यह खेल किसके फायदे के लिए?
जब ग्रामीण जनता बुनियादी सुविधाओं—जैसे स्कूल, अस्पताल, पानी और गली की सड़क—के लिए गुहार लगाती है, तो विभाग 'बजट की कमी' का हवाला देकर फाइलें दबा देता है। लेकिन जहां पहले से ही अरबों की सिक्स लेन योजना तय है, वहां 54 करोड़ रुपये का एक और पैचवर्क स्वीकृत कर दिया जाता है।
यह प्रशासनिक स्तर पर भारी लापरवाही या फिर जानबूझकर 'बनाओ और तोड़ो' के इस चक्र से ठेकेदारों और रसूखदारों को उपकृत करने का खेल है। पहले करोड़ों रुपये लगाकर सड़क चमकाई जाएगी, नेताजी नारियल फोड़ेंगे, और कुछ ही समय बाद सिक्स लेन के चौड़ीकरण के नाम पर उसी नई नवेली सड़क को खोद दिया जाएगा।
समय आ गया है जवाबदेही तय करने का
सड़कें कनेक्टिविटी और प्रगति का माध्यम होती हैं, लेकिन कवर्धा की यह स्थिति 'प्रगति' नहीं बल्कि 'पैसे की बर्बादी का हाईवे' नजर आती है। जब तक ग्राम पंचायतों का बुनियादी विकास नहीं होगा, तब तक शहरों में खींची गई सिक्स लेन की लकीरें देश के वास्तविक विकास का पैमाना नहीं बन सकतीं। जनता को अब मूकदर्शक बने रहने के बजाय विकास के इस असंतुलन और फिजूलखर्ची पर तीखे सवाल उठाने होंगे।

