नगर पंचायत बोड़ला: संलग्नीकरण समाप्त होने के बाद भी जमे हैं 'किराए के बाबू' सुनील कुमार खुटले, आखिर किसका है वरदहस्त?


बोड़ला
। शासन-प्रशासन के नियमों को ताक पर रखकर एक ही जगह पर कुंडली मारकर बैठे कर्मचारियों के हौसले किस कदर बुलंद हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण नगर पंचायत बोड़ला में देखने को मिल रहा है। कबीरधाम जिले के इस निकाय में 'किराए के बाबू' के रूप में पहचान बना चुके सुनील कुमार खुटले का दबदबा आज भी कायम है। चौंकाने वाली बात यह है कि उच्च अधिकारियों द्वारा संलग्नीकरण (attachment) समाप्त किए जाने के स्पष्ट आदेश के बावजूद यह कर्मचारी टस से मस होने को तैयार नहीं है।

नियम ताक पर, आदेश हवा में

शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि मूल पदस्थापना वाले स्थान पर ही शासकीय सेवकों को अपनी सेवाएं देनी हैं। प्रशासनिक व्यवस्था और पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए समय-समय पर संलग्नीकरण समाप्त करने के कड़े आदेश जारी किए जाते हैं।

सुनील कुमार खुटले के मामले में भी संलग्नीकरण समाप्ति का आदेश जारी हो चुका है, लेकिन बोड़ला नगर पंचायत में उनकी कुर्सी पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वे आज भी उसी रसूख और दबदबे के साथ एक ही जगह पर पदस्थ हैं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था और वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ रही हैं।

आखिर इस 'खास मेहरबानी' का राज क्या है?

नगर पंचायत बोड़ला के गलियारों में यह चर्चा आम है कि आखिर इस छोटे कर्मचारी पर बड़े साहबों और जनप्रतिनिधियों की इतनी मेहरबानी क्यों है? जनता और सजग नागरिकों के मन में कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं:

मजबूती का राज क्या है? संलग्नीकरण समाप्त होने के बाद भी उन्हें कार्यमुक्त क्यों नहीं किया गया?

फाइलों का मोह या कुछ और? क्या नगर पंचायत के महत्वपूर्ण विभागों और फाइलों पर एकाधिकार बनाए रखने के लिए उन्हें जानबूझकर रोका गया है?

मिलीभगत की बू: क्या इस हठधर्मिता के पीछे स्थानीय रसूखदारों और निकाय के आला अधिकारियों का मूक समर्थन (वरदहस्त) प्राप्त है?

बड़ा सवाल: जब आम कर्मचारियों पर नियम तुरंत लागू कर दिए जाते हैं, तो सुनील कुमार खुटले के मामले में प्रशासनिक तंत्र लाचार और बौना क्यों साबित हो रहा है?

जनचर्चा और आक्रोश: कामकाज की पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल 

एक ही स्थान पर लंबे समय तक जमे रहने और आदेशों की अवहेलना करने से नगर पंचायत के कामकाज की पारदर्शिता पर भी उंगलियां उठने लगी हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सजग नागरिकों का कहना है कि ऐसे मामलों से न केवल शासन की छवि धूमिल होती है, बल्कि भ्रष्टाचार और गुटबाजी को भी बढ़ावा मिलता है।

निष्कर्ष: अब कलेक्टर की कार्रवाई पर टिकी नजरें

यह पूरा मामला सीधे तौर पर अनुशासनहीनता और प्रशासनिक आदेशों की नाफरमानी का है। अब देखना यह होगा कि कबीरधाम जिला प्रशासन और नवगठित निकाय की मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) इस 'किराए के बाबू' के रसूख के आगे घुटने टेकते हैं, या फिर शासन के आदेश का पालन कराते हुए तत्काल प्रभाव से इन्हें इनके मूल विभाग/स्थान के लिए कार्यमुक्त करते हैं।

कलेक्टर महोदय को इस गंभीर विषय पर संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच करानी चाहिए, ताकि जनता का प्रशासनिक व्यवस्था पर भरोसा बना रहे।

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